गज़ल

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मेरी आँखों से मेरे ख्वाब चुराने आए अपनी औकात कई लोग दिखाने आए अपना तो चाक गिरेबाँ सिला जाता नहीं है मेरी उम्मीद को पोशाक दिलाने आए चुप था तो मेरी तरफ उंगलियां उठी कितनी बेलते ही मेरी आवाज दबाने आए तुम आकर सताओ तो कोई बात बने याद ही तेरी हमेसा क्यों सताने आए रोटी कपडा न मंगा और दवा भी तो नहीं

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